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उस तस्वीर वाली लड़की के लिए

काश ऐसा हो कि तुम फ़िर से हो जाओ इक्कीस साल की और अपनी किसी सखी के साथ कॉलेज जाओ मैं रोज़ सुबह, ठीक उसी वक़्त, जब तुम निकलती हो कॉलेज के लिए, गली के छोर पर खड़ा रहूँगा कि देख सकूँ तुम्हें अपना दिन शुरू करने से पहले या फिर ऐसा हो बाजार की किसी किराने की दुकान पर तुम मिल जाओ कभी मुझे, अचानक ही मैं देखा करूँगा तुम्हें अपनी आंखों के किनारों से  चुपके चुपके हो तो कितना अच्छा हो कि मैं किसी बस में मिलूंगा कभी तो तुम देख के मुझे चुराना नजरें और कोशिश करना न मुस्कुराने की अपने होंठो को अपने दातों से दबाते हुए मैं पकड़ लूँगा तुम्हें तुम्हारे शर्माते हुए चेहरे के साथ और हो जाना चाहूंगा एक चित्रकार कि पैंट कर सकूँ तुम्हारा वो चेहरा और छुपा सकूँ अपने कमरे की किसी अजानी जगह पर या क्यूँ न ऐसा हो जाए कि किसी बारिश वाले दिन में भूल जाओ तुम अपना छाता और मैं तुम्हें अपने छाते के नीचे बुला लूँ फ़िर तेज हवा से छाता हाथों से छूटकर उड़ जाए कहीं और भीग जाएँ हम पहले प्यार की पहली बारिश में.

Waiting for that strange girl

I waited for you at same bus stand we boarded on the bus 962, although, I was little late but you should have waited too. I was there, looking for you. You didn't show up. It'd hurt a little bit not knowing why, because you weren't there or because I was late. Maybe I was guilty. But you should have waited O Vanishing girl. Hope we would see each other again, tomorrow. Miss you, strange girl.

बजाए कोई शहनाई मुझे अच्छा नहीं लगता

बजाए कोई शहनाई मुझे अच्छा नहीं लगता मोहब्बत का तमाशाई मुझे अच्छा नहीं लगता  वो जब बिछड़े थे हम तो याद है गर्मी की छुट्टीयाँ थीं  तभी से माह जुलाई मुझे अच्छा नहीं लगता  वो शरमाती है इतना कि हमेशा उस की बातों का  क़रीबन एक चौथाई मुझे अच्छा नहीं लगता  न-जाने इतनी कड़वाहट कहाँ से आ गई मुझ में  करे जो मेरी अच्छाई मुझे अच्छा नहीं लगता  मिरे दुश्मन को इतनी फ़ौक़ियत तो है बहर-सूरत  कि तू है उस की हम-साई मुझे अच्छा नहीं लगता  न इतनी दाद दो जिस में मिरी आवाज़ दब जाए  करे जो यूँ पज़ीराई मुझे अच्छा नहीं लगता  तिरी ख़ातिर नज़र-अंदाज़ करता हूँ उसे वर्ना  वो जो है ना तिरा भाई मुझे अच्छा नहीं लगता  - आमिर अमीर

तो मैं तुम्हारा

अगर ये कह दो बग़ैर मेरे नहीं गुज़ारा तो मैं तुम्हारा या उस पे मब्नी कोई तअस्सुर कोई इशारा तो मैं तुम्हारा ग़ुरूर-परवर अना का मालिक कुछ इस तरह के हैं नाम मेरे मगर क़सम से जो तुम ने इक नाम भी पुकारा तो मैं तुम्हारा तुम अपनी शर्तों पे खेल खेलो मैं जैसे चाहे लगाऊँ बाज़ी अगर मैं जीता तो तुम हो मेरे अगर मैं हारा तो मैं तुम्हारा तुम्हारा आशिक़ तुम्हारा मुख़्लिस तुम्हारा साथी तुम्हारा अपना रहा न इन में से कोई दुनिया में जब तुम्हारा तो मैं तुम्हारा तुम्हारा होने के फ़ैसले को मैं अपनी क़िस्मत पे छोड़ता हूँ अगर मुक़द्दर का कोई टूटा कभी सितारा तो मैं तुम्हारा ये किस पे ता'वीज़ कर रहे हो ये किस को पाने के हैं वज़ीफ़े तमाम छोड़ो बस एक कर लो जो इस्तिख़ारा तो मैं तुम्हारा - आमिर अमीर, Rekhta.org

वे दिन....

मैं अक्सर काम के सिलसिले में उसके घर की गली से गुजरता हूँ तो ख्याल आता है कि कहीं वह एक दफ़ा दिख जाए तो दिल को चैन आए. मगर वह तो ऐसे ग़ायब है कि कहीं कोई इशारा नहीं मिलता. चाहत है कि उससे मुलाकातों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो. भले ही वह कुछ बोले न पर मेरे साथ मुझसे सटकर तो बैठे. जैसे कभी बैठे थे हम राजीव चौक के सेंट्रल पार्क में. एक दूजे में खोए मगर इक-दूजे से ही बे-ख़बर. वे दिन.... ♥

A strange day with strange girl

My heart was pounding. my body was shivering . it was so hard feeling of attraction to the girl sat in front of me in the bus bound to Peera Garhi. I was reading 'kino', a short story by Haruki Murakami, she was doing nothing apart from watching me nervously. maybe she was also feeling the same desire..same heart-pounding moment, or maybe not. I don't know. I even don't know if my feeling was real or just provoked by the story I had been reading for half an hour. she was still staring me omg! it was feeling too strong, even though, she was just a normal-looking girl, not that much beautiful to make me want to go near her or stare her affectionately. the bus reached its terminal. I stood up hoping and not wanting to go her away. I departed from the bus and to my wonder, she was just behind me...a step backward. and she was on my right side at the next moment. I was amazed at what kind of the girl she is oh god...! my subconscious was laughing. she came to t...